मेरे पापा फौजी थे। सूबेदार अजय सिंह। 12 कुमाऊं रेजिमेंट।
मुझे 5 साल की उम्र तक लगा कि हर पापा 6 महीने में एक बार घर आते हैं। और हर बार चॉकलेट की जगह गोलियां लेकर आते हैं - बंदूक वाली।
मैं 8 साल का था जब पापा आखिरी बार घर आए। कारगिल युद्ध खत्म हुए 4 साल हो चुके थे, पर पापा की पोस्टिंग अभी भी बटालिक में थी। बार्डर पर।
**वो आखिरी छुट्टी**
जाते टाइम पापा ने मुझे एक चिट्ठी दी। लिफाफा बंद।
“बेटा, इसे तब खोलना जब मैं 12वीं पास कर लूं। वादा कर।”
मैंने वादा किया। 12वीं में तो अभी 9 साल बाकी थे।
“और हां, तेरी मम्मी को मत बताना कि मैं ये दे गया। ये हमारा मर्दों वाला सीक्रेट है।”
मैं हंस दिया। पापा भी हंस दिए। वो आखिरी बार था जब मैंने उन्हें हंसते देखा।
**11 मई 2008**
क्लास 6 में था। स्कूल से आया तो घर में भीड़। मम्मी जमीन पर बैठी थी। सफेद साड़ी।
आर्मी की गाड़ी बाहर खड़ी थी। एक अफसर ने मुझे एक बॉक्स दिया। तिरंगे में लिपटा हुआ।
“Your father is a hero, beta. He died fighting for the country.”
हीरो? मुझे हीरो नहीं चाहिए था। मुझे पापा चाहिए थे।
उस दिन के बाद मैंने वो चिट्ठी अलमारी में सबसे ऊपर रख दी। खोलने की हिम्मत नहीं हुई। 12वीं तो दूर, मैं 7वीं में ही फेल हो गया।
**चिट्ठी का बोझ**
मम्मी लोगों के घर बर्तन मांजती। मैं बिगड़ गया। स्कूल से भागता, सिगरेट पीता, लड़ता।
हर साल 11 मई को मम्मी पापा की फोटो के सामने दिया जलाती। मैं कमरे में बंद रहता।
“पापा ने कहा था 12वीं पास करने को। मैं तो 10वीं भी पास नहीं करूंगा। चिट्ठी कभी नहीं खुल पाएगी।”
मम्मी कभी कुछ नहीं बोली। बस रात को मेरे कमरे के बाहर थाली रख जाती। मैं गुस्से में लात मार देता।
**मम्मी की आखिरी थप्पड़**
2016। मैं 19 का। 10वीं में 3 बार फेल। रात 2 बजे नशे में घर आया।
मम्मी बरामदे में बैठी थी। हाथ में पापा की फोटो।
“कहां था?”
“तेरे बाप बनने नहीं गया था।”
ठाक।
जिंदगी में पहली बार मम्मी ने मारा। फिर वो खुद ही रोने लगी।
“तेरे बाप ने अपनी जान दे दी इस देश के लिए। और तू? तू दारू पीकर नाली में पड़ा रहता है। जा, खोल ले वो चिट्ठी। देख तेरा बाप तेरे से क्या चाहता था। वैसे भी तू 12वीं पास नहीं करेगा कभी।”
मैं गुस्से में अलमारी पर चढ़ा। सबसे ऊपर से वो धूल भरी चिट्ठी निकाली। 11 साल पुरानी।
लिफाफा फाड़ दिया।
**आखिरी चिट्ठी**
अंदर एक कागज नहीं था। 3 थे।
पहला कागज - पापा की हैंडराइटिंग:
<blockquote>
मेरे शेर बेटा अर्जुन,
जब तू ये चिट्ठी पढ़ रहा होगा, तू 18 का हो गया होगा। 12वीं पास कर ली होगी।
मुझे माफ करना अगर मैं तेरे पास ना होऊं। फौज की नौकरी ऐसी ही है बेटा। हमारा घर बार्डर होता है।
मैं चाहता हूं तू फौज में आए। मेरी वर्दी पहने। पर मैं तुझ पर दबाव नहीं डालूंगा।
तू जो बने, अच्छा इंसान बनना। अपनी मां का ख्याल रखना। वो बहुत स्ट्रॉन्ग है, पर तेरे बिना टूट जाएगी।
और हां, अगर कभी लाइफ में हार जाए ना, तो ये दूसरा कागज पढ़ना।
लव यू बेटा।
तेरा पापा,
सूबेदार अजय सिंह
</blockquote>
मैं फूट-फूट कर रोया। 11 साल में पहली बार।
दूसरा कागज खोला। उसमें एक शायरी थी:
<blockquote>
बेटा, अगर जिंदगी में कभी हार लगे,<br>
तो ये समझना जंग अभी बाकी है।<br><br>
मैं बार्डर पर गोलियों से लड़ा,<br>
तू जिंदगी से लड़ना सीख।<br><br>
मेरी वर्दी पर मिट्टी लगी थी,<br>
तेरी वर्दी पर मेहनत लगनी चाहिए।<br><br>
मैं तिरंगे में लिपट कर आया,<br>
तू तिरंगे का मान बढ़ाकर आना।<br><br>
और अगर कभी मैं याद आऊं ना,<br>
तो आसमान में देखना।<br>
मैं हर स्टार में मिलूंगा,<br>
तेरा फौजी पापा, हर रात में।
</blockquote>
तीसरा कागज? उसमें 500 रुपये का नोट था। 2008 का। और एक लाइन:
“तेरी पहली सैलरी पर मिठाई खाना मेरे हिस्से की भी।”
**12 साल का इंतजार खत्म**
उस रात मैं सोया नहीं।
अगली सुबह मम्मी के पैर पकड़ लिए। “माफ कर दे मां।”
NDA की तैयारी शुरू की। 10वीं ओपन से की। 12वीं की। 3 साल लगा। 3 बार NDA में फेल हुआ।
2021। 25 साल की उम्र। NDA क्लियर।
ट्रेनिंग के आखिरी दिन, पासिंग आउट परेड। मैं अफसर बना। लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह।
मम्मी सामने बैठी थी। वही सफेद साड़ी। पर आज आंखों में आंसू नहीं, गर्व था।
मैंने सैल्यूट किया। पहले तिरंगे को। फिर मम्मी को। फिर आसमान को।
घर आकर सबसे पहले वो चिट्ठी निकाली। 500 का नोट जेब में रखा।
मिठाई की दुकान पर गया। 1 किलो लड्डू।
आधे लड्डू मम्मी को खिलाए। आधे पापा की फोटो के सामने रख दिए।
“ले पापा, आपकी मिठाई। लेट हो गया, पर वादा तो निभा दिया।”
आज मैं कारगिल में पोस्टेड हूं। उसी पोस्ट पर जहां पापा शहीद हुए थे।
हर रात मैं स्टार देखता हूं। और पापा की शायरी दोहराता हूं।
मेरी जेब में आज भी वो 500 का नोट है। गल गया है, पर फेंका नहीं।
क्योंकि कुछ चिट्ठियां आखिरी नहीं होती।
वो जिंदगी भर का ऑर्डर होती हैं।
**The End**
अगर तुम्हारे पापा फौजी हैं, तो आज उन्हें कॉल कर लो।
अगर नहीं हैं, तो भी कर लो।
क्योंकि बार्डर पर खड़ा हर फौजी, किसी का पापा है।
और घर पर इंतजार कर रहा हर बेटा, किसी फौजी का गर्व है।
जय हिंद।
