"अपनी विरासत की परछाई को समेटे हुए आज भी उन अश्कों की कहानियाँ चीख-चीख के बयान करती है, जो कभी अजर-अमर हुआ करते थे।"
"यही है मनुष्य जीवन... सोच के हमें खुद पर तरस आता है। हमने क्या खोया, क्या पाया।"
"सपने टूट-टूट कर बनते चले गए, इतना करने के बाद कुछ कमी सी रह ही गई। निशान तो बहुत गहरा दिया था, लेकिन सिर्फ याद बनके चले गए।"