चलो उस पार चलें ,
जहाँ बस हम दो रहें…
ना दुनिया की हलचल हो ,
ना कोई शिकवे गिले रहें…
जहाँ हर पल ठहर जाए ,
ज़िम्मेदारियों की भागमभाग रहे...
चलो मोहब्बत को फिर
हल्का-हल्का सा रंग दें ,
दिलों के रिश्ते में
गर्मजोशियाँ भर दें…
वक़्त का भी तकाज़ा है ,
मिज़ाज बनने में वक़्त लगे...
चलो उस पार चलें ,
जहाँ बस हम दो रहें…...
आओ सखी हम लोग उस पहाड़ी के उस कोने पर मिलते हैं!
डॉ आशुतोष सिंह