सोनपुर गांव गंगा किनारे बसा था। वहाँ रहता था बुधना किसान। उम्र कोई 40 साल, कद का नाटा, पर मेहनत में पूरा पहाड़। उसकी दुनिया दो ही चीजों में बसती थी — एक उसकी 2 बीघा जमीन, और दूसरा उसका बैल 'नंदी'।
नंदी कोई आम बैल नहीं था। ऊँचा-पूरा, काला-चमकीला, सींग ऐसे जैसे चाँद का टुकड़ा। पर सबसे बड़ी बात — नंदी बोल सकता था। हाँ, इंसानों की बोली।
ये राज सिर्फ बुधना जानता था। नंदी ने पहले दिन ही शर्त रखी थी, "मालिक, मैं हल खींचूंगा, गाड़ी खींचूंगा, पर किसी तीसरे के सामने मुंह नहीं खोलूंगा। जिस दिन किसी और ने मेरी आवाज़ सुन ली, मैं उसी दिन गंगा में समा जाऊँगा।" बुधना ने सिर हिला दिया था। बोलने वाला बैल किस्मत से मिलता है।
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1. अकाल का साल
उस साल बारिश नहीं हुई। सावन सूखा निकल गया, भादो में भी बादल रूठे रहे। सोनपुर के खेत दरारों से भर गए। जमींदार का कारिंदा हर घर से लगान मांगने आया।
बुधना के पास अनाज का एक दाना नहीं था। कारिंदा बोला, "लगान नहीं देगा तो बैल खोल ले जाएंगे। बाजार में 200 चांदी के सिक्के मिल जाएंगे इसके।"
रात को बुधना फूट-फूटकर रोया। नंदी ने चुपचाप सुना, फिर बोला, "रोते क्यों हो मालिक? कल मुझे हाट ले चलो।"
"हाट? बेचने?" बुधना कांप गया।
"बेचने नहीं। खेल दिखाने।" नंदी मुस्कुराया।
अगले दिन हाट में भीड़ थी। नंदी बीच में खड़ा हुआ। बुधना ने ढोल बजाया। फिर नंदी बोला, "ऐ सोनपुर के लोगों, जो मुझसे सवाल पूछेगा, मैं जवाब दूंगा। पर शर्त है — हर सवाल के बदले 1 तांबे का सिक्का।"
पहले तो लोग हंसे। बैल बोलेगा? फिर एक बच्चे ने पूछा, "तेरा नाम क्या है?"
नंदी बोला, "नंदी। लाओ सिक्का।"
भीड़ उछल पड़ी। बोलने वाला बैल! देखते-देखते लाइन लग गई। कोई पूछे "कल बारिश होगी?", कोई पूछे "मेरी भैंस कहाँ गई?" नंदी हर बात का जवाब देता। शाम तक बुधना की झोली में 5 चांदी के सिक्के थे। लगान भर गया, और 2 महीने का खाना भी।
पर बुधना डर गया। "नंदी, तूने कहा था किसी के सामने नहीं बोलेगा।"
नंदी ने आँख मारी, "मैं बोला कहाँ? लोगों ने सुना। मैंने तो सिर्फ तुम्हारे लिए मुंह खोला था, हवा ने बात फैला दी।" बुधना समझा — नंदी जितना वफादार है, उतना ही चालाक भी।
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2. जमींदार की चाल
बात उड़ते-उड़ते जमींदार ठाकुर विक्रम सिंह तक पहुँची। ठाकुर लालची था। उसने सोचा, "बोलने वाला बैल मेरे दरवाजे पर बंधे, तो राजा तक नाम होगा। शायद दरबार में इनाम मिले।"
उसने सिपाही भेजे। "बुधना, बैल लेकर हवेली आ। 500 सिक्के दूंगा।"
बुधना ने हाथ जोड़े, "मालिक, नंदी बिकाऊ नहीं। वो मेरे बेटे जैसा है।"
ठाकुर हंसा, "किसान की औकात? कल तक का समय है। नहीं लाया तो खेत भी जाएगा, झोपड़ी भी।"
रात को नंदी ने कहा, "डर मत मालिक। कल मुझे ले चलना। रस्सी ढीली रखना।"
अगले दिन हवेली में दरबार सजा था। आसपास के गांव के मुखिया, बनिया, पंडित सब आए थे बोलने वाला बैल देखने। ठाकुर सिंहासन पर बैठा इतराता रहा।
ठाकुर ने हुक्म दिया, "ए बैल, बोलकर दिखा।"
नंदी चुप।
ठाकुर ने चाबुक उठाया, "बोलता है या नहीं?"
नंदी फिर चुप।
ठाकुर का चेहरा लाल हो गया। "किसान, तूने मुझे उल्लू बनाया? सिपाहियो, कोड़े लगाओ इस बैल को!"
जैसे ही पहला कोड़ा पड़ा, नंदी दहाड़ा। पर इंसानी बोली में नहीं — शेर जैसी आवाज़ में। पूरी हवेली कांप गई। फिर नंदी इंसानी आवाज़ में गरजा, "ठाकुर विक्रम सिंह, तूने पिछले साल विधवा सुगनी की जमीन हड़पी थी। उसका खेत लौटा, नहीं तो मैं बोलूंगा कि तेरे अनाज के गोदाम में सरकारी टैक्स का चोरी का गेहूं भरा है।"
ठाकुर का रंग उड़ गया। गोदाम में सच में चोरी का गेहूं था। मुखियाओं ने कान खड़े कर लिए। नंदी फिर बोला, "और बनिया हरिलाल, तू तेल में चर्बी मिलाता है। पंडित जी, आपने पिछले महाशिवरात्रि का चढ़ावा घर ले गए। बोलूं सबके कच्चे चिट्ठे?"
दरबार में सन्नाटा। सबकी चोरी नंदी कैसे जानता था? असल में नंदी हाट-बाजार में चुपचाप सब सुनता था। बैल समझकर कोई उससे पर्दा नहीं करता था।
ठाकुर कांपते हुए बोला, "चुप रह... चुप रह... ले जा अपने बैल को। लगान माफ।"
बुधना नंदी को लेकर चला गया। रास्ते में पूछा, "तूने शर्त तोड़ दी नंदी? सबके सामने बोला।"
नंदी हंसा, "मैं तुमसे बोला था मालिक। ठाकुर के कान में हवा ने डाल दिया। मेरा वचन तुम्हारे लिए है, पापियों के लिए नहीं।"
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3. राजा का न्याय
ठाकुर ने बदला लेने की सोची। उसने राजा तक खबर भेजी, "महाराज, सोनपुर में एक किसान जादू-टोना करता है। उसका बैल भूत-प्रेत की बोली बोलता है। प्रजा भ्रम में है।"
राजा का बुलावा आया। बुधना का कलेजा मुंह को आ गया। नंदी बोला, "चलो मालिक। डर का कोई काम नहीं। पर मेरी पीठ पर उल्टे बैठना, और रास्ते भर रोते रहना।"
दरबार में राजा ने पूछा, "क्यों रे किसान, तू बैल से जादू करवाता है?"
बुधना रोते हुए बोला, "महाराज, जादू मैं नहीं, मेरा नसीब करता है। ये बैल मेरा दुख देखकर बोल पड़ता है। आज आप भी सुन लो मेरा दुख।"
फिर बुधना ने गांव का सारा हाल कहा — अकाल, ठाकुर का जुल्म, सुगनी की जमीन।
राजा ने नंदी को देखा, "क्या तू सच में बोलता है?"
नंदी बुधना की तरफ देखा और चुप रहा। फिर राजा की तरफ देखा और सिर झुका दिया। एक शब्द नहीं बोला।
राजा समझदार था। उसने कहा, "बैल बोले या न बोले, किसान की आँखें सच बोलती हैं।" उसने ठाकुर से सुगनी की जमीन वापस करवाई, लगान आधा किया, और बुधना को 5 बीघा जमीन इनाम में दी।
लौटते वक्त बुधना ने पूछा, "नंदी, दरबार में क्यों नहीं बोला?"
नंदी बोला, "मालिक, वहाँ न्याय बैठा था। जहाँ न्याय हो, वहाँ मेरी बोली की जरूरत नहीं। मैं तो तब बोलता हूँ जब इंसान बहरे हो जाते हैं।"
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4. आखिरी सीख
कई साल बीते। बुधना का घर भर गया। दो बेटे हुए। नंदी बूढ़ा हो गया। अब वो हल नहीं खींचता था, बस आंगन में बैठा जुगाली करता।
एक दिन नंदी ने कहा, "मालिक, अब मेरा समय आ गया। मैं गंगा मैया के पास जाऊँगा।"
बुधना के बेटे रोने लगे। "नंदी चाचा, मत जाओ।"
नंदी ने सबके सिर सूंघे, "मैं जा रहा हूँ, पर एक बात याद रखना। इस दुनिया में सबसे बड़ा जादू मेहनत है, और सबसे बड़ी बोली सच्चाई है। जब तक ये दो रहेंगे, कोई अकाल नहीं पड़ेगा।"
अगली सुबह नंदी आंगन में नहीं था। घाट के पंडे ने बताया कि रात को एक काला बैल गंगा में उतरा और धीरे-धीरे पानी में ओझल हो गया। डूबा नहीं, जैसे समा गया।
बुधना ने उसी जगह नंदी का चबूतरा बनवाया। कहते हैं, आज भी जब सोनपुर में कोई किसान झूठ बोलता है, तो चबूतरे से घंटी जैसी आवाज़ आती है। और जब कोई मेहनत से हार मानता है, तो हवा में कोई कहता है, "उठ मालिक, नंदी देख रहा है।"
सीख: बोलने वाला बैल चमत्कार नहीं था। चमत्कार था एक किसान का भरोसा, और एक मूक जानवर की वफादारी। जब इंसान और प्रकृति एक-दूसरे की इज्जत करते हैं, तो नंदी हर खेत में जन्म लेता है।
