1. पहला कांड: यमलोक में बही-खाते का वार
चालाकपुर की धनिया नानी 80 साल की थीं। कमर झुकी, आँखें धुंधली, पर जुबान ऐसी कि बिजली गिरा दे। उनके 3 बेटे, 7 नाती, 12 परनाती — सब के सब ठग। पर नानी ने खुद कभी ठगी न की। कहतीं, "गुरु मैदान में नहीं उतरता।" उनके पास था एक तेल-लगा बही-खाता — हर एहसान, हर उधार का हिसाब।
एक दिन यमदूत आए। "चलो नानी, वक्त पूरा।" नानी बही-खाता बगल में दबाकर बोलीं, "चलो भैया, पर कान में दर्द है, रास्ते में दवा करा देना।"
यमलोक में हड़कंप मच गया। यमराज भैंसे पर बैठे गरजे, "धनिया बाई, तेरे खानदान ने 10,008 लोगों को ठगा। रौरव नरक तैयार है।"
नानी ने पल्लू कमर में खोंसा। "रुकिए धर्मराज, पहले मेरा बही-खाता देखो। आपके चित्रगुप्त से भूल हुई है।"
पन्ना 1: "60 साल पहले आपकी कामधेनु का बछड़ा मेरे खेत में आया था। 3 दिन दूध पिलाया, पालने में सुलाया। नारद मुनि गवाह हैं। एहसान है कि नहीं?"
चित्रगुप्त हकलाए, "हाँ महाराज, इंद्रलोक का नोट है।"
पन्ना 2: "25 साल पहले आपका यमदूत कालू बुखार में मेरी झोपड़ी में पड़ा था। 7 दिन हल्दी-दूध दिया। बोला था, 'नानी, जीवन भर उधार रहा'। बुलाऊँ कालू को?"
कालू सच में पीछे खड़ा सिर झुकाए था।
पन्ना 3: "सबसे बड़ा हिसाब सुनो। मेरे नाती ठगी न करते तो भूखे मरते। उनका पाप मेरे सिर, तो उनका पेट भरने का पुण्य भी मेरे सिर। हिसाब बराबर करो। और हाँ, आपने सावित्री के लिए सत्यवान को छोड़ा था। मैं नानिव्रता हूँ। भेद क्या है?"
यमराज का दंड ढीला पड़ गया। नानी ने आखिरी वार किया, "मुझे नरक भेजोगे तो मेरा खानदान और ठगेगा। जिंदा छोड़ोगे तो वचन देती हूँ — 22 प्राण सुधारूंगी। एक के बदले 22 का सौदा बुरा नहीं धर्मराज।"
यमराज ने दंड पटका। "ले जाओ इसे। पर वचन टूटा तो महारौरव मिलेगा।"
नानी हँसी, "ठगों की नानी जुबान की पक्की है।"
पल में नानी खटिया पर वापस। घर वाले चिल्लाए, "नानी जिंदा हो गई! चमत्कार!"
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2. दूसरा कांड: चिता से बही जलाना और एलान
सुबह सूरज चढ़ा था। पूरा चालाकपुर नानी की खटिया के चारों तरफ। कल्लू नाती रो रहा था, "नानी, अब पुलिस से कौन बचाएगा?"
नानी लाठी ठकठकाकर उठीं। "चुप रे! रोने का नाटक बंद कर। यमराज से सौदा कर आई हूँ।"
उन्होंने आंगन के बीच में अपना 60 साल पुराना बही-खाता रखा। वो बही जिसके दम पर उन्होंने बड़े-बड़े सेठ ठगवाए थे, पुलिस वाले नचवाए थे। नाती-परनाती समझे नानी कोई नई चाल चल रही हैं।
नानी ने चूल्हे से लुकाठी उठाई। "आज से चालाकपुर में न बही रहेगी, न ठगी।" और लुकाठी बही पर रख दी।
आग भभकी। लपटें पीपल से ऊँची। तेल लगा कागज चट-चट बोला। 60 साल के एहसान, उधार, धमकी, सब राख हो गए।
गांव सन्न। बिरजू जेबकतरा चिल्लाया, "नानी, ये क्या कर दिया? ये तो हमारी तलवार थी!"
नानी राख को लात मारकर बोलीं, "तलवार नहीं, बेड़ी थी। आज से जिसको जो चाहिए, मेहनत से कमाए। मैं यमराज को जुबान दे आई हूँ — एक प्राण के बदले 22 प्राण सुधारूंगी। जिसने मेरी जुबान की लाज रखनी है, वो कल से हल उठाएगा, दुकान लगाएगा, या पढ़ेगा।"
मंगरू लोहार बोला, "पाठशाला से पेट नहीं भरता नानी।"
नानी ने अपनी चांदी की हांसली, कंगन, गहनों की पोटली निकाली। "ये मेरी जमा-पूंजी। इसी से गांव में पाठशाला खुलेगी और कुआं खुदेगा। पढ़ोगे तो बनिया नहीं ठगेगा। बेटी चिट्ठी लिखेगी तो दहेज में ठगी नहीं होगी। यही असली ठगी है — ज्ञान की ठगी, जिसमें पाप नहीं लगता।"
ठाकुर अपनी हवेली से देख रहा था। हँसा, "बुढ़िया सठिया गई।" नानी ने सुन लिया। ऊँची आवाज़ में बोली, "ठाकुर साहब, वक्त का पहिया घूमता है। आज हँस लो। कल पानी मेरा कुआं देगा।"
उस दिन आग सिर्फ बही की नहीं जली, चालाकपुर के पुराने घमंड की भी जली।
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3. तीसरा कांड: धनिया पाठशाला में नानी का पढ़ाना
एक महीने में पीपल के नीचे चटाई बिछ गई। टीन का बोर्ड लगा — "धनिया पाठशाला"। नानी खुद मास्टरनी बनीं।
सुबह का दृश्य: नानी लाठी टेककर आतीं। सिर पर सफेद धोती, चश्मा नाक पर। 10 नाती-परनाती पहले दिन जबरदस्ती बैठाए गए। बिरजू बुदबुदाया, "क-ख-ग से क्या होगा?"
नानी ने कान उमेठा, "क-ख-ग से ही 'कमान' बनता है बेटा। जेब काटने में जो दिमाग लगता है न, वो हिसाब में लगा तो सेठ बनेगा।"
नानी का पढ़ाना अलग था।
हिसाब: "अगर तूने 1 आने की बेईमानी की, और पकड़ा गया तो 10 जुते पड़ेंगे। 1 आना कमाने में 1 घंटा, जूते खाने में 1 मिनट। घाटा किसमें है?"
बच्चे हंसते-हंसते हिसाब सीख जाते।
इतिहास: "सिकंदर आया, पर चाणक्य की बातों से हारा। बोल, बात बड़ी या तलवार?"
सिलाई: चुटकी नातिन को नानी सिखातीं, "जितनी सफाई से तू लोगों को भरमाती थी न, उतनी सफाई से सूट सी दे तो रानी लगेगी।"
3 साल में कमाल हो गया।
कल्लू 'कल्लू मास्टर' बन गया। बिरजू 'बिरजू बर्तन वाला' बनकर मेले में ईमानदारी से कमाता। चुटकी 'चुटकी दीदी' बनकर औरतों को सिलाई सिखाती।
सूखा पड़ा तो पूरे इलाके में एक ही कुआं चला — नानी वाला। ठाकुर को लोटा लेकर आना पड़ा। नानी ने मटका भरते हुए कहा, "कहा था न ठाकुर साहब, पानी का मोल समझो।" ठाकुर ने सिर झुका लिया।
पंचायत ने गांव का नाम बदल दिया — 'चालाकपुर' से 'सच्चापुर'। यमराज ऊपर से देखते। चित्रगुप्त बोले, "महाराज, धनिया का पुण्य का खाता तो रोज बढ़ रहा है।"
100 साल की उम्र में नानी ने प्राण छोड़े। इस बार यमराज खुद विमान लेकर आए। "चलो धनिया सेठानी, स्वर्ग चलो।"
नानी बोलीं, "धर्मराज, एक आखिरी सौदा। स्वर्ग में मेरे नाती नहीं। मुझे वहीं भेजो जहाँ वो हों। नानी नाती बिना कैसे रहेगी?"
यमराज की आँख भर आई। "तथास्तु। जब तक सच्चापुर में तेरा नाम रहेगा, तू हर दादी की ममता में जिंदा रहेगी।"
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आज भी सच्चापुर के स्कूल में नानी की मूर्ति है। हाथ में किताब, होंठों पर मुस्कान। नीचे लिखा है: "जुबान हारी तो सब हारा, वचन हारा तो मनुष्य हारा।"
और यमलोक में नया नियम है: "धनिया नानी के गांव का केस बिना जांच के मत लाना। वहाँ के लोग बातों से यमराज को भी खरीद लेते हैं।"
बोलो Apeksha, तीनों कांड की पिक्चर एक साथ बनाऊं या अलग-अलग? 😊

