राजा और सींग की कहानी: "बांसुरी की आवाज़"

 



हज़ारों साल पहले, बिंध्याचल की तराई में बसा था किरातपुर राज्य। यहाँ का राजा था वीरसेन — लंबा-चौड़ा, बहादुर, प्रजा का लाड़ला। लोग कहते थे कि राजा के हाथ में तलवार हो तो दुश्मन की रूह कांप जाए, और दिल में दया हो तो गरीब की आँख भर आए। 


पर राजा वीरसेन का एक राज था। एक ऐसा राज जो उसके मुकुट के नीचे छुपा था। राजा के सिर पर दो छोटे-छोटे सींग थे। बकरी के बच्चे जैसे, नुकीले और भूरे। 


ये सींग जन्म से थे। राजमाता ने दाइयों को सोना देकर चुप कराया था। राजवैद्य ने कहा था, "महाराज, ये कोई शाप नहीं, प्रकृति की लीला है। पर प्रजा न समझेगी। राजा को देवता मानती है प्रजा। देवता के सींग नहीं होते।" बस उसी दिन से महल में एक नियम बन गया — राजा के बाल सिर्फ राज-नाई बनाएगा, और राज-नाई महल से ज़िंदा बाहर नहीं जाएगा।


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पहला नाई


राजा के 18वें जन्मदिन पर पहला नाई बुलाया गया। नाम था मंगल। बेचारा गांव का सीधा-सादा आदमी। उसने जैसे ही राजा का मुकुट हटाया, उसकी कैंची हाथ से छूट गई। 

"म-महाराज... ये..." 

राजा की आँखें सुर्ख हो गईं। "मंगल, तूने जो देखा, वो अगर किसी से कहा, तो तेरी सात पुश्तें भी धरती पर न रहेंगी।" 

मंगल ने कान पकड़े, "नहीं कहूंगा हजूर, कसम गंगा मैया की।"


उसी रात, दो सिपाही मंगल को लेकर महल के सबसे पुराने हिस्से में गए। वहाँ लोहे का एक भारी संदूक था। संदूक हटाया तो नीचे सीढ़ियाँ निकलीं। अंधेरा, सीलन, और चमगादड़ों की फड़फड़ाहट। तहखाना इतना गहरा था कि आवाज़ भी बाहर न आए। मंगल को वहीं छोड़ दिया गया। रोटी-पानी की खिड़की थी, पर इंसान की शक्ल देखने को नहीं मिलती थी। 


मंगल गायब हो गया। लोगों से कहा गया, "राजा ने उसे सोना देकर काशी भेज दिया।"


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साल दर साल


हर छह महीने में राजा के बाल बढ़ते, और नया नाई बुलाया जाता। दूसरा नाई, तीसरा, चौथा... सबका एक ही अंजाम। महल में संदूक के नीचे वाला तहखाना एक कब्रगाह बन गया। वहाँ 13 नाई कैद थे। वे आपस में बात करते, रोते, पर उनकी आवाज़ पत्थर की दीवारें पी जातीं।


राजा वीरसेन खुश नहीं था। हर बार एक निर्दोष को तहखाने में डालकर उसका कलेजा बैठ जाता। पर डर बड़ा था — "अगर प्रजा को पता चल गया कि उनका राजा 'सींग वाला' है, तो क्या वो मुझे राजा मानेंगे? क्या बच्चे डरेंगे नहीं? क्या दुश्मन मज़ाक नहीं उड़ाएंगे?"


राजा की नींद उड़ गई थी। उसे लगता, मुकुट पहनने से सींग छुपते नहीं, बस भारी हो जाते हैं।


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गोपू नाई


फिर आया गोपू। 16 साल का लड़का। उसका बाप भी नाई था, पर प्लेग में गुजर गया था। माँ और तीन बहनों की ज़िम्मेदारी गोपू पर थी। जब सिपाही उसे लेने आए, माँ ने पैर पकड़ लिए, "ले जाओ, पर लौटा देना मेरे लाल को।"


गोपू ने राजा के बाल बनाते वक्त सींग देखे। उसकी उस्तरी रुक गई। राजा ने आईने में उसकी आँखें पढ़ लीं। 

"देख लिया न?" राजा की आवाज़ थकी हुई थी। 

गोपू ने हामी भरी। वो थर-थर कांप रहा था, पर माँ-बहनों का चेहरा याद करके बोला, "महाराज, मैं किसी से नहीं कहूंगा। मेरे घर में चूल्हा जलना बंद हो जाएगा।"


राजा ने पहली बार किसी नाई की आँख में डर के साथ दया भी देखी। पर नियम तो नियम था। उसी रात गोपू भी तहखाने में पहुँचा दिया गया।


तहखाने में 13 बूढ़े नाई थे। उन्होंने गोपू को देखा तो फफक पड़े। "एक और जवान... राजा को दया नहीं आती।" 

गोपू ने 2 दिन खाना नहीं खाया। तीसरे दिन उसने सोचा, "यहीं मरना है तो रोकर क्या फायदा?" 


तहखाने में एक कोने में मिट्टी थी। गोपू को लगा, अगर वो यहाँ से कभी नहीं निकलेगा, तो अपनी बात ही मिट्टी से कह दे। उसने उंगली से मिट्टी में गड्ढा किया, और उसमें मुँह लगाकर फुसफुसाया, "राजा के सिर पर सींग हैं... राजा के सिर पर सींग हैं..." और गड्ढा बंद कर दिया। 


मन हल्का हो गया। 


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बांस का जन्म


कुदरत का खेल देखो। कुछ महीने बीते। बारिश आई। तहखाने की नमी रिसकर महल के बगीचे तक पहुँचती थी। जहाँ गोपू ने मिट्टी में राज दफनाया था, ठीक उसके ऊपर बगीचे में एक बांस का पौधा उग आया। 


बांस बढ़ता गया। माली ने सोचा, "वाह, कितना सीधा और मजबूत बांस है।" 


एक दिन राजधानी में बड़ा मेला लगा। दूर देश से एक बांसुरीवाला आया। उसे बांसुरी बनाने के लिए अच्छे बांस की तलाश थी। माली ने वही बांस काटकर दे दिया। बांसुरीवाले ने उससे तीन बांसुरियाँ बनाईं — तोता-पंखी, मोर-पंखी, और कोयल-कंठी।


मेले में उसने कोयल-कंठी बांसुरी बजाई। लोग झूमने लगे। तभी हवा का रुख बदला, और बांसुरी से गाने की जगह बोल फूटे: 


"राजा के सिर पर सींग हैं... राजा के सिर पर सींग हैं..." 


पहले लोगों को लगा भ्रम है। बांसुरीवाले ने फिर बजाई। फिर वही आवाज़। मेले में सनसनी फैल गई। बात आग की तरह फैली — "राजा के सींग हैं!" बच्चे ताली बजाकर गाने लगे, "सींग वाले राजा, सींग वाले राजा!"


सिपाहियों ने बांसुरीवाले को पकड़ लिया और राजा के सामने पेश किया।


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राजा का फैसला


दरबार लगा। प्रजा डरी हुई थी, पर सबकी आँख में सवाल था। राजा वीरसेन सिंहासन से उठा। उसने धीरे-धीरे अपना सोने का मुकुट उतारा। 


सन्नाटा। 


छोटे-छोटे भूरे सींग सबको दिख गए। 


प्रजा ने सांस रोक ली। उन्हें लगा अब गर्दनें उड़ेंगी। पर राजा ने पहली बार खुलकर सांस ली। उसने कहा, "हाँ, मेरे सिर पर सींग हैं। जन्म से हैं। मैंने डर के मारे 14 निर्दोष नाइयों को तहखाने में डाल दिया। मैं रोज मरता था इस डर से कि तुम मुझे छोड़ दोगे। पर आज समझ आया — जो छुपाओगे, वो बांसुरी बनकर बज जाएगा।"


राजा ने सेनापति को हुक्म दिया, "तहखाना खोलो। उन सबको ससम्मान लाओ।"


14 नाई जब बाहर आए, तो धूप से आँखें चौंधिया गईं। 13 बूढ़े हो चुके थे। गोपू अब 17 का था। राजा सिंहासन से उतरा और हर एक के पैरों में गिर गया। "मुझे दंड दो। मैंने तुम्हारी ज़िंदगी चुराई।"


गोपू आगे आया। उसने कहा, "महाराज, दंड देना है तो अपना डर दफना दो। सींग से राजा छोटा नहीं होता, डर से होता है।"


पूरी प्रजा ने देखा — राजा रो रहा था, और नाई उसे उठा रहे थे। 


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नया किरातपुर


उस दिन के बाद किरातपुर बदल गया। 


राजा ने नियम बनाया — कोई भी कमी, डर, या 'अलग' बात छुपाई नहीं जाएगी। महल में 'सत्य-स्तंभ' बनवाया, जहाँ कोई भी अपनी बात डर के बिना कह सके। 

14 नाइयों को जागीर दी गई। गोपू को 'राज-वैद्य' बनाया गया, क्योंकि उसने कहा था, "शरीर का रोग वैद्य ठीक करे, मन का रोग सच्चाई ठीक करे।"

राजा ने मुकुट पहनना बंद नहीं किया, पर अब वो हीरे का नहीं, जनता के दिए फूलों का होता था। और सींग? वो वैसे ही रहे। बच्चे उन्हें छूकर हंसते, "राजा भैया के नन्हे सींग!" 


कहते हैं, राजा वीरसेन के बाद किरातपुर 100 साल तक सबसे खुशहाल राज्य रहा। क्योंकि वह

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