9 साल का हेडमास्टर जिसने बंगाल के 10,000 बच्चों का भविष्य बदल दिया - बाबर अली की सच्ची कहानी।

 Introduction - जहाँ खत्म होता है बचपन, वहाँ से शुरू हुई थी उसकी स्कूल



पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक गाँव है - भाबटा। इस गाँव में न बड़ी बिल्डिंग वाला स्कूल है, न स्मार्ट बोर्ड। लेकिन यहाँ एक ऐसा स्कूल है जिसे दुनिया सलाम करती है।


इस स्कूल के हेडमास्टर ने जब स्कूल शुरू किया था, तब उसकी खुद की उम्र सिर्फ 9 साल थी। वो खुद 5वीं क्लास में पढ़ता था। आज उसी 9 साल के बच्चे के स्कूल में 10,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ चुके हैं।


उसका नाम है बाबर अली। जिसे BBC ने दुनिया का सबसे कम उम्र का हेडमास्टर कहा।


ये कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है।


Chapter 1: 9 साल के बाबर ने ऐसा क्या देख लिया था?


साल 2002। बाबर अली रोज सुबह सरकारी स्कूल जाता था। रास्ते में वो देखता था कि उसके ही उम्र के कई बच्चे ईंट-भट्टों पर काम कर रहे हैं, खेतों में बकरियां चरा रहे हैं, कूड़ा बीन रहे हैं।


उसने अपने एक दोस्त से पूछा - "तू स्कूल क्यों नहीं आता?"

दोस्त ने कहा - "मेरे अब्बा कहते हैं, स्कूल जाकर क्या करेगा? कमाएगा नहीं तो खाएगा क्या? और फीस के पैसे कहाँ से लाएं?"


ये बात 9 साल के बाबर के दिल में चुभ गई। उसे लगा, अगर ये बच्चे स्कूल नहीं जा सकते, तो क्या स्कूल इनके पास नहीं आ सकता?


उसी दिन शाम को उसने अपने घर के पीछे वाले आंगन में, एक नीम के पेड़ के नीचे, अपनी पहली क्लास लगाई।


स्टूडेंट कितने थे? सिर्फ 8। वो 8 बच्चे जो दिन में उसके साथ गिल्ली-डंडा खेलते थे। टीचर कौन? खुद बाबर। ब्लैकबोर्ड क्या? घर की टूटी हुई खपरैलों को पीसकर बनाया हुआ चॉक और बोरियों को काटकर बनाया हुआ बोर्ड।


Chapter 2: दिन में स्टूडेंट, शाम को हेडमास्टर


बाबर का रूटीन सबसे अलग था।


सुबह 6 बजे उठो, अपने सरकारी स्कूल जाओ। वहाँ 10वीं तक पढ़ो, ध्यान से सुनो कि मास्टर जी क्या पढ़ा रहे हैं। छुट्टी होते ही भागते हुए घर आओ। बस्ता फेंको, और 4 बजे तक अपने स्कूल "आनंद शिक्षा निकेतन" के हेडमास्टर बन जाओ।


जो खुद सुबह सीखा, वही शाम को अपने 8 दोस्तों को सिखा देता।


धीरे-धीरे गाँव में खबर फैल गई - "अरे वो छोटा बाबर बिना फीस के पढ़ा रहा है।"


8 से 20 हुए, 20 से 50, और 50 से 100। जब बच्चे 100 से ज्यादा हो गए तो उसके घर का आंगन छोटा पड़ गया।


तब उसके पिता, जो खुद एक जूट व्यापारी थे और ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, उन्होंने अपना छोटा सा खेत स्कूल के लिए दे दिया। वहाँ टीन की छत वाला स्कूल बना।


Chapter 3: जब पूरी दुनिया ने सलाम किया


बाबर की कहानी सबसे पहले लोकल अखबार में छपी, फिर कोलकाता के अखबारों में, फिर BBC ने उसे कवर किया। BBC ने 2009 में उसे "World's Youngest Headmaster" का टाइटल दिया।


उसके बाद क्या हुआ? लोग मदद के लिए आगे आए। IPS ऑफिसर, टीचर्स, समाजसेवी।


लेकिन बाबर ने कभी किसी से फीस नहीं ली। उसका एक ही नियम है - इस स्कूल में कोई भी बच्चा फीस नहीं देगा। किताबें? वो कबाड़ी से पुरानी किताबें लाकर देता था। यूनिफॉर्म? कोई जरूरत नहीं, जो है उसी में आओ।


आज उसके स्कूल में 800 से ज्यादा बच्चे रेगुलर पढ़ते हैं, और अब तक 10,000 से ज्यादा बच्चे यहाँ से पढ़कर निकले हैं और कई सरकारी नौकरियों में हैं।


और सबसे गर्व की बात पता है क्या? इस स्कूल के टीचर्स कौन हैं? बाबर के ही पुराने स्टूडेंट्स। जो लड़कियां कभी यहाँ पढ़ती थीं, आज वहीं टीचर बनकर दूसरी लड़कियों को पढ़ा रही हैं।


Chapter 4: बाबर आज कहाँ है?


बाबर अली ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। उसने इंग्लिश में ग्रेजुएशन किया, पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आज वो खुद पश्चिम बंगाल सरकार के स्कूल में टीचर है।


दिन में वो सरकारी स्कूल में पढ़ाता है, और शाम को आज भी अपने आनंद शिक्षा निकेतन में बिना एक रुपया लिए हेडमास्टर की कुर्सी पर बैठता है।


उसे राष्ट्रपति पुरस्कार, CNN-IBN Real Heroes Award, और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। लेकिन वो आज भी उसी साइकिल से चलता है।

1. बड़ा बदलाव करने के लिए बड़ी उम्र या बड़े पैसे की जरूरत नहीं होती। सिर्फ बड़ी नियत चाहिए। 9 साल का बच्चा भी कर सकता है तो हम क्यों नहीं? 2. शिक्षा दान सबसे बड़ा दान है। तुम किसी को खाना दोगे तो वो एक दिन खाएगा, किताब दोगे तो जिंदगी भर कमाएगा। 3. असली हेडमास्टर वो नहीं जो कुर्सी पर बैठे, असली वो है जो दूसरों को कुर्सी तक पहुंचाए। 
Conclusion:

अगली बार जब आपको लगे कि "मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?", तो मुर्शिदाबाद के इस 9 साल के हेडमास्टर को याद कर लेना। उसने दुनिया का इंतजार नहीं किया, उसने खुद ही अपनी दुनिया बना ली।

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