🇮🇳 तिरंगे को अशोक चक्र देने वाली महिला - सुरय्या त्याबजी की अनसुनी कहानी
जब हम 15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराते देखते हैं, तो हम अक्सर पिंगली वेंकैया का नाम सुनते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जो तिरंगा हम देखते हैं — केसरिया, सफेद, हरा और बीच में नीला अशोक चक्र — उसे उसका अंतिम और सुंदर रूप देने वाली एक महिला कलाकार थीं?
उनका नाम था — **सुरय्या त्याबजी (1919-1978)**।
कौन थीं सुरय्या त्याबजी?
सुरय्या त्याबजी हैदराबाद के एक पढ़े-लिखे परिवार से थीं। वो सर अकबर हैदरी की भतीजी और प्रसिद्ध डिजाइनर लैला तैयबजी की मां थीं। उनके पति बदरुद्दीन तैयबजी उस समय प्रधानमंत्री कार्यालय में एक सीनियर ICS अधिकारी थे। वो खुद एक बेहतरीन कलाकार थीं।
1947: जब चरखे की जगह अशोक चक्र आया
1947 में आज़ादी से कुछ हफ्ते पहले, संविधान सभा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक ध्वज समिति बनाई। जवाहरलाल नेहरू ने बदरुद्दीन तैयबजी को कहा कि कांग्रेस के 1931 वाले झंडे (जिसमें चरखा था) को आज़ाद भारत के झंडे में बदला जाए।
यहाँ सुरय्या और बदरुद्दीन ने एक ऐतिहासिक सुझाव दिया।
इतिहासकार Trevor Royle अपनी किताब The Last Days of the Raj में लिखते हैं — "चरखा गांधी जी और कांग्रेस का प्रतीक था, जो एक राजनीतिक दल का निशान लग सकता था। क्यों न ऐसी चीज़ लगाई जाए जो हर भारतीय को जोड़े?"
उन्होंने सम्राट अशोक के सारनाथ स्तंभ से धर्म चक्र (अशोक चक्र) को लेने का सुझाव दिया। अशोक को हिंदू और मुस्लिम दोनों सम्मान देते थे। गांधी जी भी इस तर्क से मान गए।
Flag Foundation of India के रिकॉर्ड के अनुसार, "स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का डिज़ाइन श्रीमती सुरय्या बदर-उद-दीन तैयबजी द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे 17 जुलाई 1947 को स्वीकार कर लिया गया।"
और कहा जाता है कि 14 अगस्त 1947 की रात नेहरू की कार पर जो सबसे पहला नया तिरंगा लहराया था, उसे सुरय्या जी ने अपने हाथों से सिला था।
तिरंगे की पूरी यात्रा - सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं
तिरंगा किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है। ये 40 साल के संघर्ष की कहानी है:
1. 1904 - सिस्टर निवेदिता: लाल-पीले रंग पर वज्र और कमल के साथ पहला झंडा।
2. 1906 - सचिन्द्र बोस और हेमचंद्र कानूनगो: कलकत्ता में फहराया गया ‘लोटस फ्लैग’।
3. 1907 - मैडम भीकाजी कामा: जर्मनी में विदेशी धरती पर पहला भारतीय झंडा फहराया।
4. 1917 - एनी बेसेंट और तिलक: होमरूल आंदोलन का झंडा।
5. 1921 - पिंगली वेंकैया: बेजवाड़ा में गांधी जी को लाल-हरे रंग का झंडा दिखाया, जिसे बाद में तिरंगा बनाया गया। इन्हें तिरंगे का जनक कहा जाता है।
6. 1921 - महात्मा गांधी: इसमें सफेद रंग और चरखा जोड़कर इसे सर्व-धर्म प्रतीक बनाया।
7. 1947 - सुरय्या और बदरुद्दीन तैयबजी: चरखे की जगह अशोक चक्र लगाकर इसे कांग्रेस के झंडे से निकालकर देश का झंडा बनाया।
हमें क्यों याद रखना चाहिए?
सुरय्या त्याबजी की कहानी हमें याद दिलाती है कि भारत का तिरंगा किसी एक धर्म, जाति या पार्टी का नहीं है। इसे बनाने में हिंदू, मुस्लिम, महिला, पुरुष — सबका खून-पसीना लगा है।
इसी समावेशी सोच की वजह से आज हमारा तिरंगा इतना सुंदर और सबका अपना लगता है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर, पिंगली वेंकैया से लेकर सुरय्या त्याबजी तक — तिरंगे के हर सिपाही को हमारा सलाम! जय हिंद! 🇮🇳
