Robertsganj नाम कैसे पड़ा - पूरी डिटेल
1. पुराना नाम - ताड़ का दौर
अंग्रेजों से पहले इस पूरे इलाके को ‘ताड़ का दौर’ कहा जाता था। ताड़ के पेड़ों से घिरा होने की वजह से लोकल लोग इसे यही बोलते थे। उस समय ये मिर्जापुर रियासत का हिस्सा था और काफी घना जंगल था।
2. 1928 में नाम बदला गया
ब्रिटिश हुकूमत अपने हिसाब से शहरों, कस्बों और रेलवे स्टेशनों के नाम बदल रही थी ताकि अंग्रेज अफसरों को याद रहे। इसी कड़ी में **1928 में ताड़ का दौर का नाम बदलकर Robertsganj कर दिया गया**। 8bc6
3. किसके नाम पर? - फील्ड मार्शल फ्रेडरिक रॉबर्ट्स
इस शहर का नामकरण ब्रिटिश-राज में अंग्रेजी सेना के फील्ड मार्शल फ्रेडरिक रॉबर्ट्स (Frederick Sleigh Roberts) के नाम पर हुआ था।
फ्रेडरिक रॉबर्ट्स 1885 से 1893 तक भारतीय ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ थे। इन्हें अफगान युद्ध में जीत के लिए बहुत बड़ा हीरो माना जाता था और बाद में इन्हें अर्ल ऑफ कंधार का खिताब भी मिला था। 8bc6
अंग्रेजों ने सोनभद्र जैसे स्ट्रेटेजिक इलाके - जो कोयला, जंगल और पहाड़ों से घिरा है - पर अपनी पकड़ दिखाने के लिए अपने सबसे बड़े जनरल के नाम पर इसका नाम रख दिया।
4. अब क्या है नाम?
ये शहर उत्तर प्रदेश के दक्षिणी पूर्वी कोने पर स्थित है और 4 मार्च 1989 को मिर्जापुर से अलग होकर सोनभद्र जिला बना।
Robertsganj को ही नए जिले का मुख्यालय बनाया गया। औपचारिक रूप से शहर का नाम अब सोनभद्र है, पर लोग आज भी इसे Robertsganj ही कहते हैं।
यहाँ तक कि Robertsganj रेलवे स्टेशन का नाम भी अंग्रेज अफसर फ्रेडरिक रॉबर्ट के नाम पर ही पड़ा था, जिसे बाद में 2018 में बदलकर सोनभद्र रेलवे स्टेशन कर दिया गया।
सवाल ये है कि:
1. वो अंग्रेज कौन था?
जिसके नाम पर Robertsganj है, उसका पूरा नाम है - फील्ड मार्शल फ्रेडरिक स्ले रॉबर्ट्स, प्रथम अर्ल रॉबर्ट्स
कहाँ से आया था?
ये मजेदार बात है - वो इंग्लैंड से नहीं, बल्कि तुम्हारे पड़ोस कानपुर (Cawnpore) से था!
जन्म: 30 सितंबर 1832 को कानपुर में हुआ था, तब उसे Ceded and Conquered Provinces कहा जाता था।
परिवार: उसके पिता जनरल सर अब्राहम रॉबर्ट्स थे, जो आयरलैंड के वाटरफोर्ड के रहने वाले एंग्लो-आयरिश परिवार से थे। माँ इसाबेला एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड) की थीं।
करियर: 1851 में वो ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल आर्टिलरी में भर्ती हुआ। 1857 के विद्रोह में दिल्ली और लखनऊ में लड़ा, और बहादुरी के लिए ब्रिटेन का सबसे बड़ा मिलिट्री अवार्ड विक्टोरिया क्रॉस मिला।
बाद में वो अफगान युद्ध और बोअर युद्ध में जीता, और 1885 से 1893 तक पूरे भारतीय ब्रिटिश सेना का कमांडर-इन-चीफ रहा। अंग्रेज सिपाही उसे प्यार से "Bobs" कहते थे।
1928 में जब अंग्रेजों ने ‘ताड़ का दौर’ का नाम बदलकर Robertsganj किया, तो इसी जनरल को सम्मान देने के लिए किया।
2. ये जमीन किसकी थी? Robertsganj से पहले कौन राज करता था?
ये जमीन किसी एक राजा की नहीं, हजारों साल से आदिवासियों की रही है।
a) सबसे पुराने मालिक - गोंड, चेरो, खरवार, बैगा
सोनभद्र की गुफाओं - जैसे लखनिया दरी, सलखन की गुफाओं में मिले 5000 साल पुराने भित्ति-चित्र बताते हैं कि यहाँ प्रागैतिहासिक काल से ही मानव रहता था। आजादी से पहले तक यहाँ 90% आबादी गोंड, चेरो, खरवार, अगरिया और बैगा जनजातियों की थी। अंग्रेजों के कागजों में भी इसे ‘गोंडवाना’ का हिस्सा लिखा जाता था।
b) चंदेल, चेरो वंश और बनारस रियासत
इतिहास कहता है कि 11वीं-12वीं सदी में यहाँ विजयगढ़ और अगोरी के चंदेल राजाओं का राज था। देवकीनंदन खत्री के चंद्रकांता उपन्यास का विजयगढ़ किला वहीं है।
उसके बाद चेरो वंश ने राज किया। 18वीं सदी में बनारस के राजा बलवंत सिंह ने इस जंगल वाले इलाके को अपने कब्जे में ले लिया। तब से ये बनारस स्टेट का हिस्सा बन गया। बनारस स्टेट के पास ‘ताड़ का दौर’ जैसे जंगल को संभालना मुश्किल था, तो उन्होंने अंग्रेजों को लगान वसूली का हक दे दिया।
c) फिर अंग्रेजों ने ले लिया
1775 में बनारस संधि के बाद कंपनी सरकार ने सीधे कंट्रोल ले लिया। उन्होंने पूरे जंगल को सरकारी जंगल घोषित कर दिया और आदिवासियों को ही उनकी जमीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ बना दिया। उसी आदिवासी जमीन पर 1928 में उन्होंने अपने जनरल के नाम पर Robertsganj बसा दिया।
इसलिए आज भी कहा जाता है - सोनभद्र जिले में सोनभद्र नाम की कोई जगह ही नहीं है, ये तो आदिवासियों के ‘ताड़ का दौर’ को अंग्रेजों ने Robertsganj बना दिया था, और आजादी के बाद हम उसी नाम को जिला मुख्यालय बनाए हुए हैं।
"कानपुर में जन्मा अंग्रेज और आदिवासियों की छीनी गई जमीन - Robertsganj का वो सच जो किताबों में नहीं है"
