दुनिया के किसी भी अस्पताल में जब इलाज के दौरान किसी मरीज की मौत हो जाती है तो दो तरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। एक तरफ परिवार कहता है कि इलाज में लापरवाही हुई है, दूसरी तरफ अस्पताल कहता है कि मरीज की हालत पहले से ही गंभीर थी। लेकिन कई बार एक तीसरी कहानी भी सामने आती है, जहाँ सारा दोष अस्पताल के सबसे छोटे कर्मचारी पर डाल दिया जाता है। हाल ही में दुनियां में हुई कई ऐसी ही घटना ने फिर से यही सवाल खड़ा कर दिया है - क्या मौत सिर्फ सुई लगाने से होती है या उसके पीछे कोई और बड़ी वजह होती है?
यह ब्लॉग किसी एक व्यक्ति, किसी एक अस्पताल या किसी एक शहर की कहानी नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की कहानी है जहाँ एक मरीज एक छोटे से बुखार या सामान्य तकलीफ के लिए अस्पताल जाता है और फिर कभी वापस नहीं आता।
1. घटना कैसे होती है?
एक सामान्य दिन। एक मरीज को बुखार या कोई सामान्य तकलीफ होती है। परिवार उसे पास के एक निजी क्लिनिक या अस्पताल में ले जाता है। वहाँ उसे भर्ती कर लिया जाता है।
डॉक्टर आता है, कुछ जांच लिखता है और उसके बाद एक इंजेक्शन लगाने को कहता है। इंजेक्शन अस्पताल में मौजूद एक स्वास्थ्यकर्मी लगाता है। कुछ देर तक सब ठीक लगता है, लेकिन अचानक मरीज की हालत बिगड़ने लगती है। सांस लेने में तकलीफ, घबराहट, शरीर का ठंडा पड़ना। और कुछ ही घंटों में मरीज की मौत हो जाती है।
परिवार के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं होता। वो सोचते हैं कि वो तो सिर्फ बुखार के लिए आए थे, फिर ऐसा क्या हो गया कि मरीज चला गया। हंगामा होता है, पुलिस आती है, प्रशासन जांच की बात करता है और अखबार में खबर छपती है - "इंजेक्शन के बाद मरीज की मौत, परिजनों ने लगाया लापरवाही का आरोप।"
यह पैटर्न दुनिया के कई हिस्सों में लगभग एक जैसा ही है।
2. क्या सिर्फ सुई लगाने से मौत हो सकती है?
यह सबसे बड़ा भ्रम है जो फैलाया जाता है। अक्सर कहा जाता है कि नर्स ने गलत इंजेक्शन लगा दिया इसलिए मौत हो गई। लेकिन सच यह है कि सिर्फ सुई चुभाने से किसी की मौत नहीं होती। मौत होती है उस दवा से जो सुई के जरिए शरीर में डाली जाती है।
इसे ऐसे समझिए -
पहला कारण - गलत दवा का चुनाव: हर बीमारी की दवा अलग होती है। बुखार वायरल भी हो सकता है और बैक्टीरियल भी। बिना सही जांच के अगर कोई तेज एंटीबायोटिक इंजेक्शन दे दिया जाए तो वो शरीर को फायदा नहीं, नुकसान पहुंचाता है। शरीर उसे स्वीकार नहीं कर पाता।
दूसरा कारण - गलत डोज: दवा की मात्रा मरीज के वजन, उम्र और बीमारी के हिसाब से तय होती है। एक ही दवा की मात्रा एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति के लिए अलग होगी और एक कमजोर व्यक्ति के लिए अलग। अगर डोज ज्यादा दे दी गई तो वही दवा जहर बन जाती है।
तीसरा कारण - दवा का रिएक्शन: इसे मेडिकल भाषा में एनाफाइलेक्सिस कहा जाता है। कुछ लोगों को कुछ खास दवाओं से बहुत तेज एलर्जी होती है। इंजेक्शन लगते ही शरीर में अचानक रिएक्शन शुरू हो जाता है। गला बंद हो जाता है, सांस रुकने लगती है, ब्लड प्रेशर गिर जाता है। अगर दो से पांच मिनट के अंदर इसका इलाज न मिले तो जान जा सकती है। इसीलिए किसी भी नई दवा से पहले एलर्जी के बारे में पूछना बहुत जरूरी होता है।
चौथा कारण - दवा की गुणवत्ता: कई बार दवा एक्सपायर हो चुकी होती है, या उसे सही तापमान पर नहीं रखा जाता। फ्रिज में रखी जाने वाली दवा अगर गर्मी में रखी रहे तो वो खराब हो जाती है। ऐसी दवा लगाने पर सीधा रिएक्शन होता है।
इसलिए जब भी ऐसी मौत होती है तो सबसे पहला सवाल यह होना चाहिए कि कौन सी दवा दी गई थी, क्यों दी गई थी और कितनी दी गई थी, न कि किसने लगाई थी।
3. सारा दोष छोटे स्टाफ पर क्यों डाल दिया जाता है?
यह इस तरह की घटनाओं का सबसे दुखद हिस्सा है।
जब कोई बड़ा हादसा होता है तो अस्पताल प्रबंधन सबसे पहले अपने सबसे छोटे कर्मचारी को आगे कर देता है। कहा जाता है कि नर्स ट्रेंड नहीं थी, उसने गलती कर दी।
ऐसा क्यों किया जाता है?
बड़े नाम को बचाने के लिए: किसी भी निजी अस्पताल में बड़ा डॉक्टर ही ब्रांड होता है। उसी के नाम पर मरीज आते हैं। अगर सीधा डॉक्टर पर आरोप लगेगा तो अस्पताल की साख खत्म हो जाएगी। इसलिए छोटे स्टाफ को हटाकर मामला शांत करने की कोशिश की जाती है।
नौकरी पर किसने रखा?: अगर यह सच भी है कि इंजेक्शन लगाने वाला व्यक्ति ट्रेंड नहीं था, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसे नौकरी पर किसने रखा? उसे मरीजों को इंजेक्शन लगाने की इजाजत किसने दी? इसका जवाब तो अस्पताल के मालिक को ही देना पड़ेगा।
पर्ची ही सबसे बड़ा सबूत है: अस्पताल में कोई भी नर्स या कर्मचारी अपने मन से दवा नहीं लिख सकता। दवा का नाम, उसकी मात्रा, सब कुछ डॉक्टर ही अपनी पर्ची पर लिखता है। उस पर्ची पर डॉक्टर का हस्ताक्षर होता है। तो अगर दवा ही गलत थी, तो दोषी वह है जिसने वह दवा लिखी, न कि वह जिसने उसे लगाया।
पूरे सिस्टम की कमी: कई जगहों पर निजी क्लिनिक दिन में छोटे स्टाफ के भरोसे चलते हैं और डॉक्टर सिर्फ शाम को कुछ देर के लिए आते हैं। जब तक डॉक्टर आए, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इसलिए किसी एक नर्स को दोषी कहना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक पूरे सिस्टम की नाकामी है।
4. सही जांच कैसे होनी चाहिए?
अगर ऐसी किसी घटना की सही जांच करनी है तो कुछ बातें बहुत जरूरी हैं -
दवा का पूरा हिसाब: डॉक्टर ने पर्ची पर कौन सी दवा लिखी, फार्मेसी से कौन सी दवा निकली, और मरीज के खून में कौन सी दवा मिली। इन तीनों का मिलान होना चाहिए। अगर तीनों अलग-अलग हैं तो कहीं न कहीं गड़बड़ी है।
सीसीटीवी और मौजूदगी: अस्पताल के सीसीटीवी से पता चलता है कि इंजेक्शन लगते समय डॉक्टर वहां मौजूद था या नहीं। क्या इमरजेंसी के समय ऑक्सीजन और दूसरी दवाएं उपलब्ध थीं।
अस्पताल की क्षमता: क्या उस क्लिनिक के पास उस तरह के मरीज का इलाज करने की इजाजत भी है? क्या वहां इमरजेंसी को संभालने की सुविधा है? क्या वहां काम करने वाले लोग सच में ट्रेंड हैं?
पोस्टमार्टम रिपोर्ट: पोस्टमार्टम ही बताता है कि मौत दवा के रिएक्शन से हुई या किसी और कारण से।
अगर इन सभी बिंदुओं पर ईमानदारी से जांच हो तो ही सच सामने आता है।
5. इस तरह की घटनाओं से क्या सीख मिलती है?
यह घटना सिर्फ एक मरीज की नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक चेतावनी है।
पहली सीख - सवाल पूछना सीखें: जब भी अस्पताल में कोई इंजेक्शन लगाया जाए तो पूछने का हक है - यह कौन सी दवा है, क्यों दी जा रही है, इसका कोई साइड इफेक्ट तो नहीं है। एक जागरूक मरीज ही सुरक्षित मरीज होता है।
दूसरी सीख - स्वास्थ्य को व्यापार न बनने दें: आज कई जगहों पर क्लिनिक सिर्फ पैसे कमाने के लिए खोले जा रहे हैं। बिना योग्य स्टाफ और बिना सुविधा के। इसका नुकसान आखिर में मरीज को ही भुगतना पड़ता है।
तीसरी सीख - छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा न बनाएं: अगर कोई हादसा होता है तो सिर्फ नर्स को नौकरी से निकाल देने से कुछ नहीं होगा। जब तक दवा लिखने वाले और अस्पताल चलाने वाले की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे रुकेंगे नहीं।
चौथी सीख - सिस्टम को मजबूत करना: लोग निजी क्लिनिक में इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है वहां जल्दी इलाज मिलेगा। अगर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत होगी, हर जगह ट्रेंड डॉक्टर और दवाएं होंगी, तो लोगों को मजबूरी में ऐसी जगहों पर नहीं जाना पड़ेगा।
आखिरी बात
एक इंजेक्शन की कीमत कुछ रुपयों की हो सकती है, लेकिन एक गलत इंजेक्शन एक परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ देता है। एक मरीज जो चल कर अस्पताल जाता है, वो यह सोच कर जाता है कि अब वह ठीक हो जाएगा। उसे क्या पता कि जो दवा उसे ठीक करने के लिए दी जा रही है, वही उसकी जान ले लेगी।
दोष किसका है? उस हाथ का जिसने सुई लगाई, या उस कलम का जिसने गलत दवा लिखी, या उस सोच का जिसने बिना सुविधा के अस्पताल खोल दिया? शायद तीनों का थोड़ा-थोड़ा दोष है, लेकिन सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसकी है जिसके पास फैसले की कलम है।
क्योंकि सुई तो सिर्फ एक जरिया है, असली असर तो उसके अंदर की दवा का होता है। और दवा तय करने वाला हमेशा डॉक्टर ही होता है।

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