हनुमान अंश को संभालने वाली शक्ति - श्रीमती राम बेटी देवी, नीम करौली बाबा की अर्धांगिनी




प्रस्तावना: जब विधाता ने दो भूमिकाएँ लिखीं


जब भी हम नीम करौली बाबा का नाम लेते हैं, तो हमारे सामने एक हँसता हुआ चेहरा, सफेद कंबल, और "राम-राम" का मंत्र आता है। हम कैंची धाम की बात करते हैं, अमेरिका तक उनके भक्तों की बात करते हैं, उनके चमत्कारों की बात करते हैं।


पर हम एक नाम भूल जाते हैं। वो नाम है - **श्रीमती राम बेटी देवी**। उनकी पत्नी।


विधाता जब कोई बड़ी लीला रचता है, तो वो कहानी एक ही व्यक्ति में पूरी नहीं लिखता। एक को वो दुनिया को जगाने के लिए भेजता है, और दूसरे को उस जगाने वाले को इस दुनिया में टिकाए रखने के लिए। बाबा अगर आकाश हैं, तो राम बेटी देवी जी वो धरती थीं, जिन्होंने उस आकाश को संभाला।


अध्याय 1: 11 साल की उम्र में बंधा एक अटूट बंधन


कहा जाता है कि बाबा का जन्म 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गाँव में हुआ था। उनका बचपन का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा या लक्ष्मण दास था। उस समय की परंपरा के अनुसार, मात्र 11-12 साल की उम्र में उनका विवाह राम बेटी देवी जी से कर दिया गया।


उस उम्र में शायद दोनों को भी नहीं पता था कि विधि ने उनके लिए क्या लिखा है। एक को सारे बंधन तोड़ने थे, और एक को सारे बंधन निभाने थे।


शादी के बाद राम बेटी देवी जी कभी शहर नहीं गईं। वो अकबरपुर के उसी कच्चे-पक्के आँगन में रहीं, जहाँ चूल्हा जलता था, तुलसी का पौधा था, और सुबह-शाम दिया जलता था। गाँव के पुराने लोग उन्हें आज भी बेहद शांत, सरल और धैर्यवान महिला के रूप में याद करते हैं।


अध्याय 2: छोड़ना आसान है, निभाना सबसे कठिन तप है


बाबा का मन बचपन से ही वैराग्य की ओर था। 17 साल की उम्र में उन्हें ज्ञान की अनुभूति हुई, और 1958 के आसपास उन्होंने पूरी तरह से घर त्याग दिया। देश भर में घूमने लगे - लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा, तिकोनिया वाले बाबा, और अंत में नीम करौली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए।


अब सोचिए, एक स्त्री के लिए इससे बड़ी परीक्षा क्या होगी?


पति तप करने चला गया, पीछे रह गया पूरा गृहस्थ। दो बेटे - अनेक सिंह शर्मा और धर्म नारायण शर्मा, और एक बेटी - गिरिजा देवी। खेती-बाड़ी देखनी, बच्चों को पालना, समाज के ताने सुनने, और हर दिन ये इंतजार कि शायद आज वो लौट आएं।


हम कहते हैं बाबा ने त्याग किया। पर क्या राम बेटी जी ने त्याग नहीं किया? बाबा ने घर छोड़ा, उन्होंने घर को नहीं छोड़ा। बाबा ने मोह छोड़ा, उन्होंने मोह को निभाया।


बाबा जंगल में बैठ कर राम-राम जपते थे, वो चूल्हे पर रोटी बनाते हुए, बच्चों को सुलाते हुए राम-राम जपती थीं। एक तप बाहर दिखता था, एक तप अंदर घुटता था। और जो तप अंदर घुट कर किया जाए, वो अक्सर ज्यादा बड़ा होता है।


आश्रम के लोग बताते हैं कि बाबा पूरी तरह परिवार से अलग नहीं हुए थे। वो बीच-बीच में अकबरपुर आते थे, परिवार से मिलते थे। इसका मतलब साफ है - बाबा को भी पता था कि ये जो स्त्री आँगन में दिया जला कर बैठी है, वही मेरी गृहस्थी की नींव है।


अध्याय 3: वो पूजनीय क्यों हैं?


आज हम उन्हें क्यों पूजनीय कह रहे हैं? तीन कारणों से।


पहला - उन्होंने माँगा नहीं, दिया है। उन्होंने कभी नहीं कहा कि मुझे भी आश्रम दो, मुझे भी मंच दो, मुझे भी फूल-माला दो। वो प्रसिद्धि से कोसों दूर रहीं। जब पूरी दुनिया बाबा के पीछे दौड़ रही थी, वो अपने आँगन में चुपचाप तुलसी को पानी दे रही थीं।


दूसरा - उन्होंने रोका नहीं। वो चाहतीं तो एक पत्नी के अधिकार से कह सकती थीं - मत जाओ, मेरी जिम्मेदारी कौन लेगा? पर उन्होंने नहीं कहा। उन्होंने समझा कि ये जीव केवल मेरा पति बनने नहीं आया, ये जगत का कल्याण करने आया है। एक पत्नी के लिए अपने पति को भगवान के लिए छोड़ देना - इससे बड़ा दान क्या होगा?


तीसरा - वो नींव हैं। कैंची धाम आज अरबों लोगों की आस्था का केंद्र है। पर उस धाम की पहली ईंट इसी देवी के धैर्य से बनी है। अगर उन्होंने परिवार न संभाला होता, तो बाबा निश्चिंत होकर कैसे भ्रमण करते? कैसे भक्तों को आशीर्वाद देते? इसलिए अगर बाबा हनुमान जी के अवतार हैं, तो राम बेटी देवी जी वो अंजनी हैं, जिन्होंने उस अंश को इस धरती पर संभाल कर रखा।


इसी सम्मान में श्री नीम करौली महाराज ट्रस्ट की पहली अध्यक्ष भी वही बनीं, बाद में उनकी बेटी गिरिजा देवी जी अध्यक्ष बनीं।


अध्याय 4: दुनिया का स्वार्थ और विधाता की मर्जी


और यहीं पर आकर आपके कहे वो शब्द सच होते हैं, जो आपने अंत में जोड़ने को कहा था।


दुनिया कितनी स्वार्थी है। जिससे काम है लोग उसको तो पूजते हैं। और जिससे काम नहीं उसको भूल जाते हैं भले ही उनकी बहुत अहम भूमिका रही हो।


हमने बाबा को पूजा, क्योंकि हमें उनसे नौकरी चाहिए थी, बच्चा चाहिए था, बीमारी ठीक करवानी थी। पर हमने उस पत्नी को भूल गए, जिसने अपना पूरा जीवन बिना कुछ माँगे हमें वो बाबा दे दिया।


हम माला चढ़ाने कैंची धाम चले जाते हैं, पर अकबरपुर के उस आँगन में दिया जलाना भूल जाते हैं, जहाँ एक पत्नी ने अपने पूरे जीवन का घी उस दिए में डाला था।


पर विधाता कुछ नहीं भूलता।


इसीलिए देखिए संयोग - बताया जाता है कि राम बेटी देवी जी का निर्वाण 15 जून को हुआ, और 15 जून ही कैंची धाम का स्थापना दिवस भी है। जैसे विधाता कह रहा हो - आज एक लीला पूरी हुई, तो दूसरी लीला के मंदिर की नींव पक्की हुई।


बाबा का जाना विधि थी, उनकी पत्नी का रुकना भी विधि थी। बाबा का संत बनना विधि थी, उनकी पत्नी का गृहस्थ धर्म को परिपूर्ण बनाना भी विधि थी। दोनों ने मिलकर ही भगवान की वो कहानी पूरी की, जिसे हम आज नीम करौली बाबा की लीला कहते हैं।


इसलिए अगली बार जब आप बाबा के सामने हाथ जोड़ें, तो एक बार आँख बंद करके उस पत्नी को भी प्रणाम कर लेना, जिसने बिना एक शब्द कहे, बिना एक आशीर्वाद माँगे, ये सिद्ध कर दिया कि एक देवी के लिए अपने पति को तप के लिए छोड़ देना और फिर भी गृहस्थी को परिपूर्ण बनाना - ये भी किसी तपस्या से कम नहीं।


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