नई बाजार के नीलकमल मेडिकल वाले जयराम चाचा - जब रेखा की पहली सैलरी से दुकान पर घड़ी आई



Robertsganj से अगर आप नई बाजार जाओगे, तो एक दुकान ऐसी है जहाँ दवा से ज्यादा भरोसा मिलता है - नीलकमल मेडिकल।


मैं पिछले 10 साल से इस दुकान को देख रहा हूँ। जब मैं पढ़ता था, तब भी और आज जब मैं खुद Doctor हूँ, तब भी।


दुकान पर बैठते हैं जयराम चाचा। उम्र करीब 58-60 साल। दुबले-पतले, हमेशा हल्की मुस्कान। 30 साल से ज्यादा हो गया उन्हें इस एक ही दुकान पर बैठे हुए।


उनकी कोई बड़ी डिग्री नहीं, बड़ा बोर्ड नहीं। बस एक छोटी सी टेबल, एक BP मशीन, पट्टी का सामान, और लोगों का भरोसा।


सुबह 8 बजे से रात 9 बजे तक वहीं मिलेंगे। किसी का बुखार हो, किसी के बच्चे को चोट लग गई हो, किसी बुजुर्ग का BP बढ़ गया हो - सब पहले जयराम चाचा के पास ही आते हैं। "चाचा, देख लो जरा" - और चाचा बिना फीस लिए देख लेते हैं।


मैं अक्सर शाम को उनके पास बैठता था। दुकान पर ज्यादा भीड़ नहीं होती तो हम चाय पीते। वो अपनी जिंदगी की कहानियाँ सुनाते।


एक ही बात हमेशा कहते - "अशुतोष बेटा, पढ़ लो। Robertsganj में एक अच्छी सोच वाले डॉक्टर की बहुत जरूरत है। पैसा कमाना बड़ी बात नहीं, लोगों का भरोसा कमाना बड़ी बात है।"


उनकी एक ही बेटी है - रेखा। मैं जब छोटा था तब रेखा 8-9 क्लास में थी। स्कूल से आते ही दुकान पर आ जाती, पापा का हिसाब में मदद करती।


पिछले 2 साल से रेखा ANM की पढ़ाई कर रही थी। चाचा बताते थे - "बेटी दिन भर पढ़ती है, रात को दुकान पर आती है। खर्चा बहुत है, पर कोई बात नहीं।"


पिछले हफ्ते मंगलवार की बात है। मैं नई बाजार दवा लेने गया। नीलकमल मेडिकल पर भीड़ थी। अंदर देखा तो एक लड़की सफेद कोट में दवा दे रही है।


मैंने ध्यान से देखा - अरे ये तो वही रेखा है! जो मेरे से पागलो जैसा प्यार करती थी। उस समय वो मेरे को अच्छी नहीं लगती थी बाद में अच्छी लगने लगी। मैं जब वहां जाता मुझे कुछ न कुछ खाने के लिए देती। 


पहले से ज्यादा Confident लग रही थी और सुंदर भी हो गई थी पर मेरे जितना नहीं क्योंकि मेरे से प्यार करने वालों की लिस्ट में कोई कमी नहीं थी वो अलग बात है मेरी शादी रेखा से ही हो गई।


जयराम चाचा ने मुझे देखते ही आवाज दी - "आओ अशुतोष बेटा, देखो कौन आया है।"


"पहचाना जी?" रेखा बोली।


"बिल्कुल, और बहुत बधाई! सुना ANM हो गया?"


"हाँ जी, पिछले महीने ही सरकारी हॉस्पिटल में जॉइन किया है। संविदा पर है, 12 हजार मिलता है।"


चाचा का चेहरा देख रहा था मैं। ऐसा गर्व मैंने पहले किसी बाप के चेहरे पर नहीं देखा। 30 साल की मेहनत जैसे आज सफल हो गई हो।


तभी रेखा ने अपने बैग से एक छोटा सा नीले रंग का डिब्बा निकाला।


"पापा, आपके लिए।"


चाचा ने डिब्बा खोला। अंदर एक घड़ी थी। कोई बहुत महंगी Titan नहीं, पर अच्छी कंपनी की, काले डायल वाली।


"पहली सैलरी से लाई हूँ।"


दुकान पर एकदम सन्नाटा हो गया।


जयराम चाचा 30 साल से दूसरों का बुखार, BP नापते आए हैं। पर उनके खुद के हाथ में कभी घड़ी नहीं देखी मैंने। दीवार पर टंगी पुरानी Ajanta घड़ी से टाइम देखते थे। कई बार तो ग्राहक से ही पूछ लेते थे - "भैया कितना बजा?"


चाचा ने कांपते हाथों से घड़ी पहनी। आँखें भर आईं।


"पता है अशुतोष," चाचा बोले, "जब रेखा को ANM में एडमिशन दिलाया था, तो लोग क्या-क्या बोले थे। 'बेटी को इतना क्यों पढ़ा रहा है, इतना पैसा क्यों फेंक रहा है, शादी कर दे।' मेरी पत्नी भी डरती थी।"


"मैंने सिर्फ एक बात कही थी - मेरी बेटी पहले अपने पैरों पर खड़ी होगी, फिर शादी होगी। आज देखो, इसने अपनी पहली कमाई से मुझे वक्त दिया है।"


रेखा की आँखें भी नम थीं।


मैंने रेखा से पूछा, "हॉस्पिटल में पहला दिन कैसा था? डर लगा?"


वो हँस के बोली, "बहुत डर लगा जी। बड़ी-बड़ी नर्स, डॉक्टर। मैं तो नई बाजार की छोटी सी लड़की। फिर सोचा, मेरे पापा 30 साल से बिना किसी बड़ी डिग्री के नई बाजार के लोगों की सेवा कर रहे हैं। लोगों का भरोसा जीता है। मैं तो फिर भी ANM हूँ। फिर डर खत्म हो गया।"


मैंने चाचा की तरफ देखा। वो घड़ी को बार-बार देख रहे थे। कभी टाइम देख रहे थे, कभी घड़ी को सहला रहे थे।


उस दिन मैं दवा लेना भूल गया। खाली हाथ लौट आया।


रास्ते में सोच रहा था - हम सफलता को कितनी गलत जगह ढूंढते हैं। हमें लगता है सफलता Mumbai में है, Delhi में है, बड़ी बिल्डिंग में है, लाखों की सैलरी में है।


पर असली सफलता तो नई बाजार के नीलकमल मेडिकल में है।


जहाँ एक बाप ने समाज के तानों के बाद भी अपनी बेटी को पढ़ाया।


जहाँ एक बेटी ने अपनी 12 हजार की पहली सैलरी में से 800 रुपये की घड़ी निकाल कर अपने बाप को पहनाई।


उस घड़ी में टाइम नहीं चल रहा था, उस घड़ी में एक बाप की 30 साल की ईमानदारी, तपस्या और भरोसा चल रहा था।


आज भी जब मैं नई बाजार जाता हूँ, तो देखता हूँ जयराम चाचा उसी घड़ी में टाइम देख कर दवा देते हैं। और रेखा शाम को ड्यूटी से आकर वहीं बैठती है।


बाप-बेटी की जोड़ी, और एक छोटी सी दुकान - यही है मेरे Robertsganj की असली कहानी।


- Dr. Ashutosh Singh

Author - संघर्ष - एक नन्हा कदम जिंदगी की ओर

Singer - Aaj Ki Raat 2


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