"ट्रेन ने पैर छीन लिया, पर हौसला नहीं - एवरेस्ट फतह करने वाली पहली दिव्यांग भारतीय"


Introduction - एक लड़की जिसे सबने खत्म मान लिया था




सोचो, तुम नेशनल लेवल की खिलाड़ी हो, तुम्हारा करियर तुम्हारे सामने है। एक रात तुम नौकरी के इंटरव्यू के लिए ट्रेन में बैठती हो और अगली सुबह तुम अस्पताल में हो, तुम्हारा एक पैर कटा हुआ है। डॉक्टर कह रहा है अब तुम चल भी नहीं पाओगी।


ज्यादातर लोग वहीं खत्म हो जाते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर की एक लड़की ने उसी अस्पताल के बेड पर वो फैसला लिया जिसने दुनिया की सोच बदल दी। उसका नाम है अरुणिमा सिन्हा।


ये कहानी सिर्फ एवरेस्ट की नहीं है, ये उस जिद की है जो पैर से नहीं, हौसले से चलती है।


1. कौन थीं अरुणिमा सिन्हा ट्रेन हादसे से पहले?


अरुणिमा एक बहुत ही साधारण परिवार से थीं। पिता आर्मी में थे, माँ हेल्थ डिपार्टमेंट में। बचपन से ही उन्हें दो चीजों से प्यार था - वॉलीबॉल और देश की वर्दी। वो नेशनल लेवल की वॉलीबॉल प्लेयर थीं और CISF में नौकरी के लिए बार-बार कोशिश कर रही थीं।


11 अप्रैल 2011, उनके पास लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए पद्मावत एक्सप्रेस का जनरल टिकट था। बैग में नया ट्रैकसूट, सर्टिफिकेट्स और आंखों में एक सपना था कि इस बार नौकरी लेकर ही लौटना है।


उन्हें क्या पता था, ये सफर उनकी जिंदगी का आखिरी नॉर्मल सफर होगा।


2. वो काली रात - 11 अप्रैल 2011, बरेली के पास


रात के करीब 1 बजे थे। ट्रेन बरेली जंक्शन पार कर रही थी। जनरल डिब्बे में कुछ लुटेरे चढ़े। उन्होंने यात्रियों से चेन, पर्स छीनना शुरू किया।


अरुणिमा के गले में सोने की चेन थी। एक लुटेरे ने खींची। अरुणिमा पहलवान थीं, उन्होंने विरोध किया। अकेली लड़की का विरोध उन अपराधियों को बर्दाश्त नहीं हुआ।


उन्होंने अरुणिमा को चलती ट्रेन से धक्का दे दिया। अरुणिमा ट्रैक पर गिरीं। इससे पहले वो समझ पातीं, सामने से आ रही दूसरी ट्रेन उनके बाएं पैर के ऊपर से गुजर गई।


हड्डियां चकनाचूर हो गईं, खून बहने लगा। वो चिल्लाती रहीं, लेकिन रात के अंधेरे में किसी ने नहीं सुना। पूरी रात, करीब 7-8 घंटे तक वो दो पटरियों के बीच तड़पती पड़ी रहीं। सुबह लोगों ने उन्हें देखा तो मरा हुआ समझकर पटरियों से हटाकर दूसरी तरफ फेंक दिया। वहां से भी एक और ट्रेन गुजरी जिसने उनके पैर को और रौंद दिया।


3. जब डॉक्टर ने कहा - "अब तुम कभी नहीं चल पाओगी"


उन्हें पहले बरेली के एक छोटे अस्पताल में ले जाया गया, फिर लखनऊ और फिर दिल्ली के AIIMS में। इंफेक्शन फैलने से बचाने के लिए डॉक्टरों के पास एक ही रास्ता था - पैर को घुटने के नीचे से काटना।


24 साल की लड़की, नेशनल प्लेयर, एक पैर गंवा चुकी थी। मीडिया आई, फोटो खींचे, और चली गई। रेलवे ने पहले तो कहा कि "वो तो ट्रेन से कूद कर आत्महत्या कर रही थी"।


हर कोई सहानुभूति दे रहा था। लेकिन अरुणिमा को सहानुभूति नहीं चाहिए थी।


AIIMS के बेड पर लेटे-लेटे उन्होंने टीवी पर एक रिपोर्ट देखी - सचिन तेंदुलकर का कोई मैच। भीड़ चिल्ला रही थी। उन्होंने अपनी माँ से कहा - "माँ, लोग मुझे दया से नहीं, तालियों से देखेंगे।"


और वहीं उन्होंने कागज पर लिखवाया - "मैं माउंट एवरेस्ट पर चढ़ूंगी।"


नर्स ने सोचा दर्द की दवा का असर है।


4. सपना जो पागलपन लगता था


भारत की पहली एवरेस्ट फतह करने वाली महिला बछेंद्री पाल से मिलने अरुणिमा नकली पैर लगाकर गईं। बछेंद्री पाल ने उन्हें ऊपर से नीचे देखा और कहा - "तुम कर लोगी?"


अरुणिमा ने कहा - "हाँ।"


उसके बाद शुरू हुई असली जंग। टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन में ट्रेनिंग। एक पैर नकली, उसमें से मवाद निकलता था, खून आता था। नकली पैर पहनकर चलना ही एक टॉर्चर था, पहाड़ चढ़ना तो दूर की बात।


वो रोज 15 घंटे प्रैक्टिस करतीं। उत्तरकाशी के बर्फीले पहाड़ों पर गिरतीं, उठतीं, फिर चढ़तीं। लोग कहते - "अरे एक पैर से एवरेस्ट मजाक है क्या?"


5. 21 मई 2013 - इतिहास का वो दिन


2 साल की ट्रेनिंग के बाद फाइनल दिन आया। एवरेस्ट पर ऑक्सीजन कम होती है, हर कदम पर मौत है। अरुणिमा की टीम धीरे-धीरे ऊपर जा रही थी।


आखिरी के 100 मीटर में उनकी ऑक्सीजन खत्म होने वाली थी। शेरपा ने कहा वापस चलते हैं। अरुणिमा ने कहा - "मैं मर जाऊंगी पर वापस नहीं जाऊंगी।"


21 मई 2013, सुबह 10:55 पर, उन्होंने नकली पैर के साथ एवरेस्ट के शिखर पर तिरंगा गाड़ दिया। वो दुनिया की पहली महिला दिव्यांग बनीं जिन्होंने एवरेस्ट फतह किया।


ऊपर पहुँचकर उन्होंने सबसे पहले अपने उस नकली पैर को देखा और रो पड़ीं।


6. एवरेस्ट तो सिर्फ शुरूआत थी


कई लोग सोचते हैं कहानी यहीं खत्म हो गई। नहीं, अरुणिमा ने यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने दुनिया के 7 महाद्वीपों की 7 सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ाई की है - माउंट किलिमंजारो अफ्रीका में, माउंट एलब्रुस यूरोप में, माउंट कोसियस्जको ऑस्ट्रेलिया में।


आज उन्हें पद्मश्री, तेनजिंग नोर्गे अवार्ड मिल चुका है। उन्होंने एक किताब भी लिखी है - "Born Again on the Mountain"।


तुम्हारे ब्लॉग के लिए Conclusion - क्या सीखें?


अरुणिमा की कहानी हमें 3 बातें सिखाती है जो हर ब्लॉग रीडर अपने जीवन से जोड़ सकता है:


शरीर विकलांग होता है, सोच नहीं।

लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं, उससे तुम्हारी कहानी तय नहीं होती। तुम खुद क्या लिखते हो, उससे होती है।

बदला लेने का सबसे अच्छा तरीका है - इतना बड़ा बन जाना कि जिन्होंने तुम्हें गिराया था, वो तुम्हें देख ही न पाएं।


अगर एक लड़की एक पैर से एवरेस्ट चढ़ सकती है, तो हम अपने छोटे-छोटे बहानों के पीछे कब तक छुपेंगे?


---

ब्लॉग टिप: इसके आखिर में एक सवाल जरूर जोड़ना - "आपकी जिंदगी का एवरेस्ट क्या है? कमेंट में बताइए।" 

क्या यह लेख उपयोगी था?

Facebook WhatsApp

🔔 नए लेख की notification पाएं — Subscribe करें!

👥 इस साइट को Follow करें

टिप्पणी करें / Leave a Comment

अपना नाम, ईमेल भरें और comment करें।

0 टिप्पणियाँ

अपनी टिप्पणी लिखें